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Big breaking:-यहाँ भाँग से बना होमस्टे , जानिए क्या है खासियत

उत्तराखंड के पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने यमकेश्वर क्षेत्र के फल्दाकोट मल्ला में भांग से निर्मित भवन का उद्घाटन किया। उन्होंने दावा किया कि यह देश के पहला भांग से निर्मित भवन है। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि हेम्प इको स्टे प्रोजेक्ट के माध्यम से न्रमता कंडवाल और गौरव दीक्षित ने देश और प्रदेश के युवाओं के सामने बड़ी मिसाल पेश की है। उन्होंने कहा कि आज प्रदेश का युवा हजारों की नौकरी के लिए महानगरों की ओर पलायन है। जबकि वह स्वरोजगार को अपनाकर वह स्वावलंबी बन सकता है।

 

 

 

 

बुधवार को  हिमालयन हैंप इको स्टे प्रोजेक्ट के उद्घाटन के दौरान त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ग्लोबल हाउसिंग टेक्नोलॉजी के विजेता युवा उद्यमी नम्रता कंडवाल और गौरव दीक्षित की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि पौड़ी के पोखड़ा ब्लॉक में युवा उद्यमियों से उनकी पहली मुलाकत हुई थी।

 

 

 

 

 

उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं को भांग के क्षेत्र में काम करते हुए देख वे खासे प्रभावित हुए। जिसके बाद उन्होंने दोनों युवाओं को देहरादून बुलाकर योजना की पूरी जानकारी ली। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा आज दोनों युवाओं की स्वरोजगार क्षेत्र में की गई सार्थक पहल उनको फाल्दाकोट मल्ला तक खींच लाई।

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यमकेश्वर के फल्दाकोट भांग की लकड़ी से इको स्टे प्रोजेक्ट की मोनोलिथ वाल्स और मेसनरी ब्लॉक यूनिट्स का निर्माण किया गया है। भांग के रेशे से रीनफोर्सड लाइम और क्ले प्लास्टर किया गया है। वहीं थर्मल और साउंड इन्सुलेशन के लिए छत भी भांग से बनाई गई है।भवन में चीड़ ओर तुन की लकड़ी पर भांग के बीज के तेल से पॉलिश की गई है। भवन में चादर, तकिये कवर, टॉवल, रग्स आदि भांग के रेशे से तैयार किए गए हैं। भवन में रेनवाटर हार्वेस्टिंग भी की गई है। जबकि तीन मेगावाट क्षमता के सोलर पैनल्स से भवन अपनी बिजली स्वयं बनाएगा। वेस्ट वाटर को भी किचन गार्डन में डायवर्ट किया गया है। भवन में तड़ित चालक यंत्र भी लगा हुआ है। भवन के निर्माण में कुल 30 लाख का खर्च आया। वहीं भवन निर्माण के लिए 10 लाख की मशीन त्रिवेंद्र सिंह रावत की ओर से मुहैया कराई गई।    पूर्व सीएम ने कहा कि भांग केवल पौधा नहीं एक कल्पवृक्ष है। उन्होंने कहा कि आज भांग से 550 से अधिक उत्पाद बनाए जा रहे हैं। कैंसर से लेकर असहाय दर्द के इलाज में भांग का प्रयोग हो रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े उद्योगों की कल्पना करना बेमानी है।

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कुटीर उद्योग पहाड़ में स्वरोजगार योजना को धरातल पर उतारते का सबसे कारगार विकल्प है। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय बाजार मुहैया कराने के साथ लोगों में सहकारिता के संस्कार को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।कहा कि यह एक औषधीय कुटिया है। आज दवाओं, आभूषण, कपड़े, इत्र और ईंट आदि उत्पादों को बनाने में भांग का प्रयोग हो रहा है। उन्होंने दावा किया कि चिकित्सकीय अनुसंधान के मुताबिक भांग कैंसर के इलाज में भी काफी उपयोगी साबित हो रही है। प्रदेश में भांग की प्रोटेक्टिव फार्मिंग की जरूरत है, जिससे ब्रीड का संरक्षित रख शुद्ध उत्पाद बनाए जा सकें। उन्होंने कहा कि संभ्रात वर्ग आज हस्तनिर्मित और जैविक उत्पादों को तवज्जों दे रहा है।यूरोप इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। देश विदेश के उद्यमी उत्तराखंड में भांग की खेती के लिए पांच से 10 हजार हेक्टेयर भूमि उपलब्ध कराने की मांग कर रहे हैं। लेकिन कुटीर उद्योग ही प्रदेश के पर्वतीय स्वरोजगार का सबसे बड़ा मॉडल साबित होगा। उन्होंने कहा जब धीरे धीरे कुटीर उद्योग पर्वतीय क्षेत्रा में फैल जाएगा, तब स्वरोजगार के प्रति लोगों को रुझान भी बढ़ेगा।

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लेकिन इसके लिए सभी को अपने अंदर सकारात्मक सोच पैदा करनी होगीकहा कि दुग्ध उत्पाद बनाने वाली अग्रणी कंपनी अमूल को भी शुरूआत में नुकसान उठाना पड़ा था। लेकिन जब कंपनी ने सहकारिता तंत्र विकसित करने के लिए गांवों का रुख किया तो अमूल कंपनी का कारोबार अरबों में पहुंच गया। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड में स्वरोजगार की योजना को परवान चढ़ाने के लिए स्थानीय बाजार मुहैया कराने होंगे।

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