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Big breaking:-तो बचपन मे हरदा भी ककड़ी चोर थे , आज भी स्वाद को याद कर आ जाता है उनके मुंह मे पानी

हरीश रावत आए दिन फेसबुक पर अपने संस्मरण बताते रहते हैं ऐसे में अब उन्होंने बचपन की ऐसे संस्मरण सामने रखे हैं जिसको सुन हर कोई एक बार जरूर मुस्कुरा जाएगा और यादों में खो जाएगा कि शायद हमने भी ऐसा ही किया हो जहां हरीश रावत ने प्रसंग लिखा है इस बार ककड़ी चोरी का हरीश रावत लिखते हैं कि

म्यर घरैकि #काकड़ी तेरि जै हो,
ऊपर गांव से कुछ ककड़ियां आ गई। सर्दी-जुखाम लगा था, खा नहीं पाया, बहुत मलाल हुआ। देहरादून से दिल्ली आते वक्त मौसम की खराबी के कारण फ्लाइट ने कुछ टाइम ज्यादा ले लिया तो मेरे मन में विचारों की एक लंबी श्रंखला काकड़ी को लेकर चल पड़ी। बचपन से लेकर 18-19 साल का होने तक न जाने किस-किस गांव की ककड़िया मैं और मेरे दोस्त खा गये! मगर किसी ने कभी रश्मि आक्रोश दिखाने के अलावा कुछ नहीं कहा और न कुछ करा। दूर-दूर के गाँव चल्सिया, पड़ोली की ककड़ियां भी खा गये, मगर किसी ने प्रिंसिपल साहब से आकर शिकायत नहीं की। हमारी करतूत को उम्रजन्य शरारत मानकर लोग गुस्सा होते थे, मगर फिर माफ कर देते थे।

हमारे गांव में ठांगड़ी पर जंगल से चीड़ का जवान पेड़ काटकर के लाते थे और उन पर गड़वैंसी आदि की शाखाएं डालकर ककड़ी की बेल चढ़ाई जाती थी। मैं और चीजों की बेल में उतनी दिलचस्पी नहीं लेता था, मगर काकड़ी की बेल में और एक #लोबिया होता है उसकी सब्जी मुझे बड़ी पसंद थी, उसकी बेल में मैं जरूर दिलचस्पी लेता था। मैं उनकी बेलों में रोज दो-दो बार पानी डालता था। जितना धूप के नजदीक ककड़ी होती है, उतनी ही वो स्वादिष्ट। क्या अद्भुत स्वाद होता था और स्वाद ने हमको #ककड़ी_चोर भी बना दिया। मगर हमारा चोरी का फार्मूला बड़ा दिलचस्प था।

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पहले अपने घर की ककड़ी की चोरी करता था, उसको सब दोस्तों को खिलाता था, शाम के वक्त जहां हम #कबड्डी खेलने के लिए एकत्रित होते थे, वहां यह सब पंच बटवारा होता था। प्रतिदिन रात को किसी न किसी घर की ककड़ी जरूर चोरी जाती थी और हम यह सुनिश्चित करते थे, जिस घर की ककड़ी चोरी गई है उस बच्चे को भी ककड़ी खिलाएं। फिर हम सब बच्चे उसके चारों तरफ घेरा डाल कर कहते कि अब तू मर जायेगा क्योंकि तुम्हारी माँ ने गाली दी है कि “#ककड़ी चोर मर जाएं” और फिर हम सब मरने का नाटक करते थे, हर वर्ष 2 महीने हमारा यह नाटक चलता था। वो पहले तो समझ नहीं पाता था, फिर वो समझ जाता था कि मेरे दोस्तों ने ही ये ककड़ी की चोरी की है और मुझको मेरी ही घर की ककड़ी खिला दी है। यह क्रम सभी बच्चों तक चलता था और सारे गांव को मालूम था कि ये और कोई नहीं हैं, ये हमारे ही अपने बच्चे हैं। खैर जब आगे की कक्षाओं में गये तो चोरी के कार्य क्षेत्र का विस्तार भी हो गया।

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मेरे गांव में अब हम पुरानी ककड़ी चोर आठ एक लोग ही बचे हैं। कभी शादी-विवाह के मौके पर चोरी का जिक्र आता है तो हम सब प्रफुल्लित भाव से हंसते हैं। अब कहां, किस कीमत पर उस समय का #बचपन पाया जा सकता है? हम आज के बचपन की रक्षा करें, यही ककड़ी चोरी का हमारा प्रायश्चित हो सकता है।
“#जय_काकड़ी”
#uttarakhand

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