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Big breaking :-हरीश रावत ने कही बड़ी बात, कांग्रेस की रूचि मुझपर घटती जा रही हैं पता नहीं कब तक कांग्रेस मुझे खुद से जोड़े रखना चाहती हैं

मैंने कुछ समसामयिक विषय जब तक बहुत आवश्यक न हो, तो उस पर अपने विचार व्यक्त न करने का एक अघोषित निर्णय सा किया था, चाहे वह पार्टी से संबंधित हो या उत्तराखंड के आम मुद्दों से संबंधित हो। मगर कुछ सवाल ऐसे उठ जाते हैं, जिन पर कुछ न कहना भी अपने आपके साथ अन्याय है। एक ऐसा ही महत्वपूर्ण मामला पिथौरागढ़-लिपुलेख होकर संचालित होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा भी है। यह तीसरा वर्ष है, जब #मानसरोवर यात्रा के संचालन के विषय में हम कुछ नहीं सुन रहे हैं। 2 वर्ष तो समझ में आया कि कोरोना संक्रमण के कारण यात्रा का संचालन नहीं हो पाया, लेकिन इस बार भी यात्रा के संचालन को लेकर कुछ सुनाई नहीं दे रहा है।

 

 

 

जब से सिक्किम से यात्रा कैलाश मानसरोवर की प्रारंभ हुई, तब से निरंतर एक लॉबी इस कोशिश में है कि कुमाऊं मंडल द्वारा संचालित हो रही इस यात्रा रूट को छोड़ दिया जाए। चीन भी नहीं चाहता कि इस यात्रा का संचालन हो। क्योंकि ये काला पानी के जिस इलाके से होकर गुजरती है, चीन सीमा विवाद के उस प्रसंग को उकसाने में भी नेपाल के पीछे है। मगर इस यात्रा का न केवल ऐतिहासिक, पौराणिक महत्व है। चीन के लिए असुविधाजनक होते हुए भी हमारे लिए एक बेहतर व्यापार मार्ग भी कैलाश मानसरोवर का यह यात्रा मार्ग उपलब्ध करवाता है। न जाने क्यों केंद्र सरकार द्वारा अपेक्षित रुचि नहीं दिखाई जा रही है?

 

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1981 में जब यह यात्रा पुनः प्रारंभ हुई थी, #इंदिरा जी ने अपने संपूर्ण राजनयिक कौशल का उपयोग कर चीन को इस यात्रा के संचालन के लिए सहमत करवाया था और सौभाग्य से उस यात्रा के प्रारंभ होने के प्रथम दल में मैं भी सम्मिलित था तो आज जब यात्रा पर अनिश्चय के बादल मंडरा रहे हैं, तो मेरा मन 1981 की यात्रा के उस समय के प्रसंगों व स्थितियों आदि पर कुछ लिखने और कुछ कहने को आतुर हो रहा है।

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मैं अपनी स्मृति को निरंतर कुरेद रहा हूं कि कुछ लिखूं। यूं इस यात्रा को लेकर अतीत में भी बहुत लिखा गया है और हमारे बाद भी बहुत सारे लोगों ने इन यात्रा मार्गों को लेकर बहुत कुछ लिखा है। लेकिन 1981 में इस यात्रा का अपना महत्व था तो मैं उस पर कुछ लिखने का प्रयास करना चाहता हूं। देखें कोई श्रद्धालु आगे आकर मुझे प्रेरित करते हैं या नहीं करते हैं! पिछली बार कुछ लिखने के लिए संडे पोस्ट समाचार पत्र के अपूर्व जोशी जी ने प्रेरित किया था, इस बार उनकी रूचि भी मुझ में घट गई है। हारे हुये व्यक्ति में रूचि कम होना स्वाभाविक है, वो क्यों अपनी ख्याति प्राप्त अखबार का प्लेटफार्म मुझे उपलब्ध करवाएंगे! खैर बहरहाल मैं कुछ उस पर लिखना चाहता हूं और कांग्रेस में भी मुझ पर रुचि घटती जा रही है, पता नहीं कितने दिन #कांग्रेस मुझे अपने से जोड़े रखना चाहती है!

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तो ऐसे समय में 2000 से 2002 तक की #पदयात्रा के प्रसंगों पर भी मैं कुछ लिखना चाहता हूं। हो सकता है आगे आने वाले कांग्रेसजनों को अपनी संघर्ष यात्रा में हमारी उस समय की उस यात्रा के प्रसंगों से कुछ प्रेरणा मिल सके और धीरे-धीरे मेरे बहुत सारे मित्र छट रहे हैं। अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर और चंपावत के उस क्षेत्र में आज तो लगभग सभी कोनों में सड़कें पहुंच चुकी हैं, जब बहुत लंबे-लंबे बड़े कठिन इलाकों में सड़कें नहीं पहुंची थी, तो समय भी मैंने पैदल चलकर के उन क्षेत्रों का भ्रमण किया था, उस भ्रमण के मेरे साथी भी समय के साथ धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं, उनको याद करते हुए भी कुछ लिखना चाहता हूं।
देखता हूं माँ दुर्गा का प्रेरणा देती हैं, लेकिन मैं इन तीनों प्रसंगों पर अवश्य लिखूंगा व अवश्य कहूंगा।

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