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Big breaking:-शासन को कुछ नहीं समझने वाले उत्तम की आयुर्वेद विवि के कुलसचिव पद से विदाई

देहरादून।शासन के आदेशों को रद्दी की टोकरी में डालते हुए स्वयं को आयुर्वेद विश्वविद्यालय का सर्वेसर्वा समझने वाले डा.उत्तम शर्मा को कुलसचिव पद से हटा दिया गया है।

आयुष विभाग के सचिव चन्द्रेश यादव ने शुक्रवार को आयुर्वेद विश्वविद्यालय के कुलसचिव पद से डा.उत्तम शर्मा को हटाने के आदेश जारी किए।उनके स्थान पर आयुर्वेद विभाग के वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी डा.राजेश अदाना को कुलसचिव का दायित्व सौंपा गया है।

 

अदाना पूर्व में भी विश्वविद्यालय में उप कुलसचिव और प्रभारी कुलसचिव का बखूबी दायित्व निर्वहन कर चुके हैं।उनको पुनः कुलसचिव का प्रभार मिलने से गैरशैक्षणिक संवर्ग में खुशी का माहौल है।उन्हें उम्मीद है कि कर्मचारियों की समस्याओं का अब समयबद्ध निस्तारण हो सकेगा।डा.उत्तम शर्मा से पूर्व डा.सुरेश चौबे और डा.माधवी गोस्वामी को भी कुलसचिव बनाया गया था, जो लगभग एक वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर सके।ये सभी शिक्षक संवर्ग से रहे हैं और अपने संवर्ग के अलावा विश्वविद्यालय के अन्य संवर्ग के कार्मिकों की समस्याओं के प्रति भेदभाव का नजरिया अपनाये रहे।

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लंबे समय तक निजी कालेजों की नौकरी करने के बाद यहां सरकारी संस्थान में मोटी पगार की नौकरी पा चुके शिक्षक संवर्ग के लोगों को जब भी कुलसचिव के प्रशासनिक पद पर बैठाया गया, व्यवस्थाएं और गड़बड़ा गई।पूर्व में पीसीएस अधिकारी रामजी शर्मा को कुलसचिव बनाया गया तो प्रशासनिक व्यवस्थाएं ढर्रे पर आने लगी थी और सभी कार्मिकों के काम बिना भेदभाव सम्पन्न हो रहे थे, लेकिन भ्रष्ट तंत्र में उनकी विदाई करा दी गई।

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यही वजह है कि कार्मिकों के छुटपुट एरियर के भुगतान में बजट का रोना रोने वाले शैक्षिक संवर्ग के कुलसचिवों ने सीएएस के तहत स्वयं और अपने संवर्ग के लोगों को अनियमित भुगतान कर दिया।महालेखापरीक्षक की आपत्ति और शासन के रिकवरी के आदेश दबा दिए गए।इससे राजकोष को लगभग पचपन लाख से अधिक की क्षति पहुंचाई गई है।
डा.उत्तम शर्मा स्वयं को शायद विश्वविद्यालय का स्वामी और सीईओ समझने लगे थे और दलालों को प्रश्रय देते हुए उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर आसीन कर रहे थे।यही नहीं शासन के आदेश भी शायद उनके लिए बेमानी हो चुके थे।

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शासन के आदेशों का अनुपालन करने की परवाह न करते हुए उनका मानना था कि हम स्वायत्तशासी संस्था हैं, इसलिए शासन के आदेश हमारे लिए मायने नहीं रखते।रिक्त पदों पर पदोन्नति के संबंध में तय समय सीमा पर कार्यवाही करने के शासन के आदेश और तीन रिमाइंडर्स को भी रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया।यही नहीं विश्वविद्यालय द्वारा शासन से संबंधित मामलों की पैरवी आदि के लिए भी वह सचिवालय जाने में अपनी तौहीन समझते रहे।

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