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Big breaking:-घसियारी शब्द पर आपत्ति जताने वाले कांग्रेसी नेताओं को आईना दिखा दिया पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने

 

राज्य सरकार ने घसियारी योजना क्या शुरू की कांग्रेस नेताओं को घसियारी सबसे ही परेशानी होने लगी ऐसे में कांग्रेस के ही पूर्व अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने कांग्रेस के नेताओं द्वारा घटियारी शब्द को पहाड़ की महिलाओं का अपमान कहे जाने पर सवाल खड़े किए हैं किशोर उपाध्याय ने कहा कि

राज्य सरकार की एक योजना जिसका आरम्भ गृह मंत्री ने देहरादून में किया है, उस पर कई तरह के विचार आ रहे हैं।
योजना कितनी सफल होगी? भविष्य के गर्भ में है।
पर्वतीय क्षेत्र में पशुओं के चारे का संकट है और इसीलिये बहुत से लोगों जिसमें लघु दुग्ध व्यवसायी भी हैं, उन्होंने पशु पालन का व्यवसाय छोड़ दिया है अपने पशुओं को बेच दिया है।

 

 

Covid-II की wave में जब पूरे के पूरे गाँव लॉक डाउन की स्थिति का सामना कर रहे थे, तो गाँव में पशुओं की चारे की गम्भीर समस्या पैदा हो गयी, मुझे सम्बंधित जिलाधिकारी से समस्या के समाधान हेतु अपेक्षा की दरकार करनी पड़ी।
ग्रामीण क्षेत्र में आज भी लाखों की संख्या में हमारी बहिनें घास लाती हैं और उन्हें अपने को घसियारी कहने में कोई ग्लानि या अपमान का बोध नहीं होता है।

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मैंने स्वयं घास काटी, घास लाया और “घस्यारा” कहने पर मुझे कभी कोई अपमान का बोध नहीं हुआ।
एक बार तो घास काटते समय “दाथड़ी” से घास के साथ विषैला साँप का मुंड भी कट गया, मेरी क़िस्मत अच्छी थी, उसने मुझे नहीं काटा।
उत्तराखंड के सरोकारों से सरोबार और चेतना आन्दोलन के प्रणेता स्व. त्रेपनसिंह चौहान जी ने “घस्यारी” प्रतियोगिता का आयोजन घनसाली में किया था और सबसे अच्छी घास काटने और “पुला” बनाने वाली घस्यारी बहिनों को लाखों के ईनाम भी दिये थे।

 

पहला ईनाम सम्भवतः सवा लाख रुपये का था।
हम कब व्यवसाय को सम्मान देने की प्रवृति की ओर अग्रसर होंगे? क्या घास काटना अपराध है?
मैंने जितनी प्रतिक्रियायें पक्ष व विपक्ष में देखी हैं, उनमें से शायद ही किसी ने घास काटी हो, घास की “पुली” बांधी हो, घास का “गडोला” बांधा हो या उठाया हो?
हमारी माँ, दादी और दादी की दादी… सभी ने घास काटा है, वह भी जंगल से।

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आज भी जंगल से घास-लकड़ी लाते हुये उत्तराखंडियों को जंगली जानवर खा जा रहे हैं।जंगल हमारी ज़िंदगी थे, वे हमसे छीन लिये गये, इसलिये
उत्तराखंडियों को दो काम करने हैं:-
1. व्याप्त हीन भावना से उबरना है।
2. वनों पर अपने पुश्तैनी हक़-हक़ूक़ और अधिकार लेने हैं।वनाधिकार क़ानून में उसकी व्यवस्था है, उसे लागू करवाना है और हक़ में रूप में परिवार के एक सदस्य को योग्यतानुसार पक्की सरकारी नौकरी, केंद्र सरकार की सेवाओं में आरक्षण , बिजली पानी व रसोई गैस निशुल्क , जड़ी बूटियों पर स्थानीय समुदायों को अधिकार , जंगली जानवरों से जनहानि होने पर परिवार के एक सदस्य को पक्की सरकारी नौकरी तथा ₹50 लाख क्षति पूर्ति, फसल की हानि पर प्रतिनाली ₹5000/- क्षतिपूर्ति , एक यूनिट आवास निर्माण के लिये लकड़ी, रेत-बजरी व पत्थर निशुल्क, शिक्षा व चिकित्सा निशुल्क आदि हक़ लेने हैं।
उत्तराखंडियों को OBC घोषित करवाना है और भू-क़ानून बनवाना है, जिसमें वन व अन्य भूमि को भी शामिल जाय, राज्य में तुरन्त चकबंदी करवानी है।
और
वे सब जो आज भी घास काट रहे हैं, “घस्यारी या घस्यारा” क्या इस काम (जिसे वे inferior समझते हैं) से निजात दिलाकर और कोई (जिसे वे superior या सम्मान जनक) समझते हैं, उनके हाथों के लिये काम की व्यवस्था करेंगे या “पर उपदेश कुशल बहुतेरे” बन कर रह जायेंगे?

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