जय_श्री_केदार मीडिया के माध्यम से जानकारी में आया कि श्री केदारनाथ धाम के रावल भीमाशंकर लिंग जी ने नांदेड़ (महाराष्ट्र) में एक निजी कार्यक्रम में अपना उत्तराधिकारी घोषित किया है। जानकारी में यह भी आया है कि वर्तमान रावल जी ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए रावल पद पर श्री शांति लिंग (केदार लिंग) को अपना उत्तराधिकारी चुना है। मीडिया के अनुसार भीमाशंकर लिंग जी ने कहा कि वे स्वास्थ्य कारणों से अब केदारनाथ के रावल का पद संभालने में असमर्थ हैं। इसलिए वे अपने शिष्य शिवाचार्य शांति लिंग (केदार लिंग) को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हैं।
हालांकि, मैंने आज BKTC के अध्यक्ष श्री हेमंत द्विवेदी का बयान भी समाचार पत्रों में देखा। उन्होंने कहा है कि वर्तमान रावल जी की ओर से अभी तक औपचारिक रूप से त्याग पत्र नहीं दिया गया है। ऐसे में नए रावल की नियुक्ति प्रक्रिया तभी प्रारंभ होगी, जब वर्तमान रावल का विधिवत त्याग पत्र मिलेगा। उनका वक्तव्य उचित है।
निश्चित रूप से मंदिर समिति एक्ट में रावल, नायब रावल आदि की नियुक्ति का अधिकार BKTC को ही है। रावल, नायब रावल आदि पद भले ही धार्मिक दृष्टि से गरिमामयी व पूजनीय हैं, किंतु इन पदों पर नियुक्ति, वेतन आदि की प्रक्रिया मंदिर समिति के अन्य कार्मिकों की भांति ही है।
मेरे कार्यकाल के दौरान श्री बदरीनाथ के तत्कालीन रावल श्री ईश्वरी प्रसाद नंबदूरी जी द्वारा अपने स्वास्थ्यगत कारणों से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन किया गया था। उन्होंने निर्धारित समयावधि में अपना आवेदन प्रस्तुत किया था। BKTC ने उनके आवेदन को स्वीकार कर निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप तत्कालीन नायब को प्रभारी रावल के रूप में नियुक्त किया और नए नायब रावल की नियुक्ति के लिए आवेदन आमंत्रित किए।
चूँकि, श्री बदरीनाथ धाम के रावल और नायब रावल पद पर केरल प्रदेश के नंबूदरी ब्राह्मण ही नियुक्त हो सकते हैं। हमने केरल के दो प्रमुख समाचार पत्रों में इस संबंध में विज्ञप्ति प्रकाशित की। बाकायदा श्रेष्ठ शैक्षिक योग्यता और साक्षात्कार के आधार पर नायब रावल की नियुक्ति की।
श्री केदारनाथ धाम के रावल कर्नाटक के शैव लिंगायत समुदाय के होते हैं। वर्ष 2000 में भीमाशंकर लिंग जी की नियुक्ति से पूर्व सिद्धेश्वर लिंग जी श्री केदारनाथ धाम के रावल पद पर आसीन थे। धार्मिक मामलों और परंपराओं के जानकारों के अनुसार सिद्धेश्वर लिंग जी से पूर्व जितने भी रावल रहे हैं, वो आजन्म रहे हैं। अर्थात निर्वाण प्राप्त करने तक।
सिद्धेश्वर लिंग जी ने स्वास्थ्यगत कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से त्यागपत्र दिया था। उन्होंने भीमाशंकर लिंग जी के नाम की रावल पद के लिए संस्तुति की थी। लेकिन भीमाशंकर लिंग जी के नाम पर कुछ लोगों ने घोर आपत्ति जताई थी और उनके पट्टाभिषेक के विरोध में ऊखीमठ में आंदोलन तक हुआ था।
बहरहाल, भीमाशंकर जी द्वारा बिना त्याग पत्र दिए बिना अपना उत्तराधिकारी घोषित करना किसी भी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता है। यह ठीक है कि अभी तक श्री बदरीनाथ धाम के रावल की नियुक्ति प्रक्रिया की तरह श्री केदारनाथ धाम के रावल की नियुक्ति को लेकर मंदिर समिति में बहुत स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं। बावजूद इसके प्रबंधन व प्रशासकीय व्यवस्था को चुनौती देना उचित नहीं है।
अगर सरकार ने मंदिरों के प्रबंधन की कोई व्यवस्था सुनिश्चित की है तो उसे पूरी तरह नकारना उचित नहीं है। यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि भीमाशंकर जी द्वारा नांदेड़ में जो कार्यक्रम आयोजित किया गया था, क्या उसके लिए उन्होंने मंदिर समिति से कोई अनुमति प्राप्त की थी? मंदिर समिति के अध्यक्ष जी का बयान भी है कि रावल की नियुक्ति का अधिकार समिति को है। तो धार्मिक मान्यताओं व परंपराओं के विपरीत “रूप छड़ी” महाराष्ट्र तक कैसे पहुँच गई? मंदिर समिति के कार्मिक छड़ी को लेकर कैसे वहाँ पहुंचे?
मंदिर समिति के अध्यक्ष जी को उन अधिकारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए जो उनके संज्ञान के बिना परंपराओं को ध्वस्त कर छड़ी को महाराष्ट्र ले गए और साथ में कर्मचारियों को भी भेजा।
मेरे कार्यकाल में पहली बार मंदिर समिति के कार्मिकों के लिए सेवा नियमावली तैयार की गई थी, जिसे प्रदेश कैबिनेट द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई थी। इसी क्रम में श्री केदारनाथ धाम के रावल की नियुक्ति के लिए भी नियमावली तैयार की गई थी, किंतु मेरा कार्यकाल पूर्ण होने के कारण नियमावली को शासन को प्रेषित कर उसे स्वीकृति नहीं मिल सकी थी। मेरा बीकेटीसी अध्यक्ष जी से यह भी अनुरोध है कि इस नियमावली को कैबिनेट से पारित करवाने के लिए आवश्यक प्रयास किए जाने चाहिए ।
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