“लीडर बनाम पॉलिटिशियन “ ज्योतिष बनाम तांत्रिक”
परसों स्वराज आश्रम में आयोजित कार्यक्रम में अपने संबोधन में मैंने “लीडर एवं पॉलिटिशियन” तथा “ज्योतिष एवं तांत्रिक” के बीच फर्क को समझाने की कोशिश की। सोशल मीडिया पर बवाल मच गया, चर्चा चलने लगी कि मेरा ईशारा किसकी तरफ़ है। पूरा दिन “तांत्रिक” की खोज में लगे रहे, ख़ुद ही क़यास लगाते रहे…
थोड़ा बुद्धि, विवेक का इस्तेमाल किया होता तो समझ पाते की मेरा ईशारा किसी “व्यक्ति” की तरफ़ नहीं बल्कि “प्रवृत्ति” की तरफ़ था…
आइये जरा विस्तार से समझते हैं…
लीडर बनाम पॉलिटिशियन
लीडर – टीम गेम में मानता है और खुला खेलता है ।
अपने साथियों के लिये अवसर जुटाता है । उनके हित की सोचता है।
अपने साथियों को अपनी Asset/ पूँजी समझता है।
अपने साथियों के लिये प्रेरणा का स्रोत बनता है।
अपने हर फ़ैसले को न्याय और अन्याय के तराज़ू से तोलता है।स्पष्टवादी होता है।
कुल मिलाकर एक आदर्श चरित्र एवं विश्वसनीय व्यक्तित्व का मालिक होता है।
पॉलिटिशियन- अकेला खेलता है, वो क्या खेल रहा है इस ब्रह्मांड में उसके स्वयं के अलावा किसी को पता नहीं होता । सारी योजनाएँ स्वयं पर केंद्रित रहती हैं
स्वयं के साथी हमेशा कंफ्यूज रहते हैं ।
अपने साथियों को हथियार समझकर अपने विरोधियों पर खर्च कर देता है।
न्याय और अन्याय से फ़र्क़ नहीं पड़ता, सिर्फ़ अपने समीकरण कैसे सधेंगे, इस पर फोकस रहता है।
झूठ, छल कपट इनके व्यक्तित्व का हिस्सा होते हैं।
अपने हित साधने हेतु किसी भी षड्यंत्र को रच सकने की मानसिकता वाला होता है।
ज्योतिष बनाम तांत्रिक,
ज्योतिष – जब आप किसी ज्योतिष से परामर्श लेते हैं तो वह आपकी कुंडली का अध्ययन करके, आपके मज़बूत और सकारात्मक ग्रहों के बारे में वर्णन कर उन्हें और मजबूत करने के उपाय बताता है । आपके कमजोर ग्रहों का वर्णन कर दैविक विधि से उनके बारे में उपाय बताता है।
आपसे आपके अच्छे एवं कठिन समय का उल्लेख करता है।
किसी भी वैदिक विधि के बाद पुण्य का भागीदार होता है ।
तांत्रिक- सुनने में ही नेगेटिव और डर उत्पन्न कर देने वाला भाव लाता है।
आपको आपके विरोधियों के विनाश का उपाय बताता है। और उसके लिये तांत्रिक विधियों का प्रयोग करता है। जिसमें आपका फायदा कम और विरोधियों के नुकसान की बात अधिक होती है ।
अंततः पाप का भागी होता है।
खैर उपरोक्त विश्लेषण में , लीडर और ज्योतिष “एक केटेगरी” है तथा पॉलिटिशियन और तांत्रिक “एक केटेगरी” है । और ये किसी को लक्ष्य में रखकर नहीं बल्कि एक सामान्य बात है। हम सबको भी स्वयं को तोलने के लिए एक तराज़ू है।
मुझे विश्वास है उपरोक्त विश्लेषण काफ़ी है मेरे वक्तव्य को समझने के लिये, लेकिन फिर भी अगर “कुछ लोग” “कुछ और” ही समझ रहे हों तो फिर शायद वहीं लोग सहीं हों।
अंत में, हम अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुये स्वयं आकलन करें कि हम स्वयं या हम जिस नेता से जुड़े हैं, किस केटेगरी के क़रीब हैं।
हर सिम्त (दिशा) से लगेंगे तुझे पत्थर आकर,
ये झूठ की दुनिया है, यहाँ सच ना कहा कर ।
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